Be yourself; Everyone else is already taken.
— Oscar Wilde.
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Psychological fact & Spiritual understanding
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अनुभव करिए….. असल में जीवन गणित नहीं है, जीवन गणित से भी पार की चीज हैं।
“जीवन गणित से परे की चीज है”
श्रद्धा आस्था पर सवार होकर अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है। श्रद्धा जो होती है वह आस्था से भी सूक्ष्म गहरी होती है। आस्था और श्रद्धा ऐसी चीजें हैं जो वह देख/अनुभव/समझ लेती हैं जो प्रकाण्ड ज्ञानी विद्वान भी देख/अनुभव/समझ नहीं सकते हैं। जीवन के विकास के लिए तर्क का पक्ष उपयोगी है, यानि कि जीवन में बुद्धि का एक सीमित उपयोग है, पर असल में जीवन तर्क/बुद्धि से भी परे की चीज है। जीवन के और जीवन से परे के गहरे सूत्र आस्था और श्रद्धा में छिपे हुए हैं। पर आस्था और श्रद्धा अदृश्य हैं, पर ये को देख/अनुभव/समझ लेती हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दिया जा सकता है। जीवन गणित नहीं है। जीवन गणित से परे की चीज है। यदि हम जीवन को इस दृष्टि से देखते हैं तो हममें जीवन के जो पार है उसे भी देखने/ अनुभव कर सकने की योग्यता आ जाती है। लम्बी और गहन साधना चाहिए।

*कल का साधारण गरीब आदमी, आज का साहूकार, राजा। इसके रहस्य क्या होते हैं?*
ईश्वरीय महावाक्य हैं कि “तुम गरीब बच्चों जैसा खुशनसीब दुनिया में कोई भी नहीं है।” 15052026
“आज का साधारण गरीब आदमी और कल का साहूकार,राजा या आज का राजा और कल का साधारण गरीब आदमी” – आईए इसके परोक्ष के एक गहरे मनोविज्ञान को समझते हैं।
हम यह जानते हैं कि गरीबी कई तरह की होती हैं। गरीबी का सीधा सा मतलब होता है अभाव का अर्थात् विपन्नता का होना। इस सृष्टि में बड़ी जटिलताएं हैं। हरेक व्यक्ति किसी ना किसी प्रकार से गरीब है अर्थात् अभाव में है। किसी के पास कुछ योग्यता नहीं होती है और किसी के पास कुछ योग्यता नहीं होती है। कोई किसी तरह से गरीब होता है और कोई किसी अन्य तरह से गरीब होता है। लेकिन हमारी मान्यता के अनुसार हम केवल धन की गरीबी को ही गरीबी मानते हैं। कलयुग का एक कटु सत्य यह भी है कि धन की गरीबी की स्थिति को एक बहुत बड़ा अवगुण माना जाता है। अधिकतर लोग धन के गरीब लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं। ऐसे लोग अपने अज्ञान को प्रदर्शित करते हैं। जबकि यह प्रायः किसी को पता नहीं होता है कि धन की गरीबी भी बहुत गहरे मनोवैज्ञानिक अर्थ में एक गुण भी हो सकती है। गरीबी की परिस्थिति का होना एक चुनाव भी हो सकता है। इतना गहराई में कोई नहीं जाता है। जबकि गहराई में ही अर्थ सहित वास्तविकता छिपी हुई होती है। स्वयं त्रिकालदर्शी परमात्मा भी कहते हैं कि “तुम गरीब बच्चों जैसा दुनिया में खुशनसीब कोई भी नहीं।” क्या यह यूं ही खुश करने के लिए ही कह दिया है या इसके पीछे बहुत गहरे मनोवैज्ञानिक भावार्थ भी हैं। यह यूं ही केवल खुश करने की बात नहीं है। इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक सत्य और तथ्य हैं। जहां यह सूर्य भी नहीं पहुंच सकता है, वहां ज्ञान सूर्य पहुंच सकता है अर्थात् आत्मा के भीतर की त्रैकालिक स्थिति को वह ज्ञान सूर्य देख समझ सकता है। परमात्मा यह क्लियर देख सकते हैं कि किस किस आत्मा ने अपनी धन की गरीबी को अपनी आत्मा की उन्नति के लिए अपना चुनाव बनाया है। परमात्मा यह क्लियर देख सकते हैं कि कौन कौन सी आत्मा वर्तमान जीवन में इतनी साधारण स्थिति या गरीबी की स्थिति में क्यों हैं।
आत्माओं के सामने जन्म जन्मांतर में अनेक प्रकार की परिस्थितियां आती रही हैं। पाषाण युग (पत्थर युग) से लेकर आज तक हम असंख्य चेतन आत्माएं अनेक विषम चुनौतीपूर्ण कठिन परिस्थितियों को सहन करते हुए आईं हैं। यह 5000 वर्षों का चक्र अनगिनत बार रिपीट हुआ है। ना जाने कितनी ही परिस्थितियों के साक्षी हम आत्माएं रही हैं। क्या हमें वह सब याद है? नहीं, लेकिन वह सभी का सभी हम आत्माओं की अचेतन अवचेतन स्मृतियों में recorded है। धन की गरीबी भी एक परिस्थिति है। कुछ परिस्थितियां ड्रामा अनुसार मिलती हैं। कुछ परिस्थितियां कर्मों के अनुसार मिलती हैं। (कर्मों को प्रधान मानना अच्छी बात है। कर्मों को प्रधान मानने वाले लोगों से हमारा विनम्र अनुरोध है कि विश्व ड्रामा के सर्वोपरि होने की बात को भूलें नहीं) कुछ परिस्थितियां आत्माओं के द्वारा चुनौतियां स्वीकार करने पर मिलती हैं। हरेक आत्मा के पृथ्वी पर जन्म लेने से पहले उसके सामने कुछ चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की सूची होती है और कुछ सहज परिस्थितियों की सूची होती है। एक तरह से अगला जन्म लेने से पहले आत्माओं की दुनिया में ही उनके अगले जन्म के पूरे लाइफ प्लान का ब्ल्यूप्रिंट उनके सामने स्क्रीन पर फ्लैश होता है। उस समय आत्मा की यह स्वतंत्र choice होती है कि वह आत्मा कौन सी परिस्थिति को चुनती है। उस समय आत्माओं को उनकी चॉइस के अनुसार परिस्थिति या परिस्थितियां मिलती हैं। उस समय कुछ आत्माएं कुछ कठिन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को चुनती हैं। कुछ आत्माएं गरीबी की चुनौतीपूर्ण परिस्थिति को भी चुनती हैं। यह सब आत्मा की free will के तहत होता है। याद रहे कि आत्माओं की फ्री will की भी एक सीमा होती है। कोई भी फ्री will की सीमा cross नहीं कर सकती है। कठिन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को चुनने का उन आत्माओं का लक्ष्य एक ही होता है – आत्म उन्नति /आत्मा का विकास (consciousness evolution)। चैतन्य आत्मा में आत्म विकास की आकांक्षा अनादि अविनाशी रूप से रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मिक उन्नति करने के लिए भी इस तरह की कीमत चुकानी पड़ती है अर्थात् ऐसी परिस्थितियों का अनुभवी बनना पड़ता है। यानि कि वे आत्माएं आत्मिक उन्नति करने के लिए धन की गरीबी की परिस्थिति को स्वीकार करके आत्म विकास की कीमत चुकाती हैं। उस समय यदि वे सहज परिस्थिति चुनती है तो उनकी चेतना का विकास वैसा का वैसा ही रहता है। यह पूरी प्रक्रिया ऑटोमोटिव mode में बहुत तीव्रता से होती है। इसे ही कहते हैं कि ज्ञानयुक्त और उद्देश्य पूर्वक त्याग करने से भाग्य बनता है अर्थात् आत्मा का विकास होता है। आत्मा के विकास को ही हम अपनी भाषा में आत्मिक उन्नति कहते हैं। अन्यथा तो यूं ही त्याग करने से त्याग नेगेटिव और व्यर्थ हो जाता है। यह आत्माओं के जन्म पुनर्जन्म के बारे में अत्यन्त गहरा रहस्य है।
इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि किसी भी आत्मा के जीवन में धन की गरीबी की परिस्थिति कम से कम तीन कारणों से हो सकती है। विश्व ड्रामा में सभी आत्माओं को साहूकारी या राजाई यूं ही अपने आप नहीं मिल जाती है। यह आत्माओं की एक लम्बी विकास यात्रा का परिणाम होता है। अनादि आदि विश्व ड्रामा एक अत्यंत गहन रहस्य है। इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है। फिर भी अध्यात्म के धनी दिव्यदर्शीयों तत्वदर्शियों ने विश्व ड्रामा के बारे में कुछेक रहस्य उद्घाटित किए हैं। जो गरीबी की परिस्थिति ड्रामा अनुसार मिलती है, उस पर तो किसी भी आत्मा का वश नहीं होता है। जो गरीबी की परिस्थिति आत्माओं के कर्मों के अनुसार मिलती है, उस पर आत्मा का वश सिर्फ इतना होता है कि वह अपने उन पिछले कर्मों को पुनः रिपीट ना करे। जो गरीबी की परिस्थिति आत्माओं के चुनौतीपूर्ण स्वीकार्य करने के बाद मिलती है, उसकी निशानी यह होगी, कि वे धन गरीबी की परिस्थिति में विचलित होंगी। वे धन की गरीबी की परिस्थिति में रहते हुए भी कभी स्वयं को गरीब नहीं समझेंगी।बल्कि उनमें एक प्रकार की आंतरिक समृद्धि की स्मृति रहती है और आत्मा के उत्थान में तत्पर रहती हैं। ज्ञान, योग और सेवा का उच्चतम मानसिक धरातल भी यह बताता है कि वे ऐसी आत्माएं आत्मा के विकास के प्रति सचेत रहती हैं। उनमें उनके अचेतन की स्मृतियों का स्वमान रहता है। लोग उसे गलती से या भ्रांति से उनका अभिमान समझ सकते हैं। लेकिन वास्तव में यह उनकी आंतरिक स्मृतियों का आभास होता है। उन आत्माओं का मन और बुद्धि आत्मा की higher frequency की ओर उन्मुख होगी। उनमें भौतिक संसाधनों आदि के अनेक प्रकार का आकर्षण नहीं होगा। वे भौतिक विकास से ज्यादा आत्मिक विकास को महत्व देंगी। उनका ज्यादा से ज्यादा अटेंशन आत्मिक उन्नति (soul evolution) पर होगा। उनके सभी लक्ष्यों में से आत्मिक उन्नति करना उनका सर्वोपरि लक्ष्य होगा। वाह रे! गरीबी जो भगवान मिले, यह किंवदंती यूं ही नहीं बनी है। यह आध्यात्मिक दृष्टि रखने वाले योगियों ने कहा है। यानि कि ऐसी गरीबी जिसके होने से आत्मा का विकास हो, आत्मा कंचन बने, आत्मा पावन बन अपने उच्चतम दिव्यतम शिखर तक पहुंचे, इसके लिए गरीबी की कीमत चुकाना तो बहुत सस्ता सौदा है। तो इस किंवदंती का यही गहरा भावार्थ है।
मैं यह जानता हूं कि अधिकतर लोग इस गहरे मनोविज्ञान के शब्द ज्ञान से अवश्य मूझेँगे। लेकिन टोटल में से उन कम परसेंटेज वाले लोगों के लिए भी तो कुछ आध्यात्मिक ज्ञान का जखीरा जरूर चाहिए जो इस आध्यात्मिक प्रज्ञा (ज्ञान) को समझने की योग्यता रखते हैं। मौन में रहने से भी तो अक्सर नासमझी बढ़ जाया करती है और योग्य लोग सही, गहरे और उपयोग ज्ञान की समझ से वंचित रह जाते हैं। इसलिए आध्यात्मिक प्रज्ञा की यह विनम्र अभिव्यक्ति की गई है। इस आशा के साथ कि थोड़े लोगों तो समझ में जरूर आयेगा। थोड़े लोगों से फिर और थोड़ो तक पहुंचेगा। इसे ripple effect कहते हैं। जरा कोशिश करेंगे तो यह सबको समझने योग्य है। Thank you

*क्या चैतन्य आत्माओं की चैतन्य मालाएं भी होती हैं?*
स्वधर्मे सुकून अस्ति
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह बहुत ही गहन और गंभीर समझने वाली अनिवार्य विषय है। हम एक पिता परमात्मा की संतान होने के बावजूद भी, एक ही परमात्मा शिवबाबा की रुद्र माला के मनके होने के बावजूद भी, चैतन्य आत्माओं के एक ही चैतन्य वृक्ष (कल्प वृक्ष) के होने के बावजूद भी, हम सभी चैतन्य आत्माओं की अलग अलग मालाएं हैं। भक्ति मार्ग में इसे माला शब्द नाम दिया है। यदि इसे दूसरे terms में कहें तो इसे group भी कह सकते हैं। अव्यक्त रूप में भी और साकार रूप (जीवधारी/देहधारी) में भी अलग अलग चैतन्य मालाएं कहिए या ग्रुप कहिए, बात एक ही है। हमारी आस्था और विश्वास जो हमने बना दिए हैं, कि हम सब एक ही हैं, एक परमपिता की संतान हैं, एक तरफ तो यह ठीक है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी सही है कि इस चैतन्य आत्माओं के वृक्ष में भी अलग अलग ग्रुप या sections हैं। ये sections या groups इहलोक में भी हैं और परलोक में भी, जिसे अव्यक्त आत्माओं का लोक कहते हैं, उसमें भी हैं। इसे गलत या नेगेटिव ना समझें। ये अनादि आदि रूप से हैं। यह परम श्रोत परमात्मा शिव के द्वारा ही architecture किया हुआ है। हम परमात्मा से ज्यादा समझदार बुद्धिमान बिल्कुल नहीं हैं। दूसरे ग्रुप्स को, या डाल डालियों को हेय को दृष्टि से या हीन भावना की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। वे अनादि हैं। उनका भी अनादि अस्तित्व है। वे भी परमात्मा की चैतन्य संतान हैं। उनका भी अपना self respect होता है।
धर्मों की दृष्टि से आत्माओं के लोक में इन ग्रुप्स की निश्चित संख्या हो सकती है। लेकिन चैतन्य आत्माओं के वृक्ष का जब साकार दुनिया में स्वरूप प्रकट और अप्रकट स्वरूप होता है, उस हिसाब से इस साकार लोक या अव्यक्त लोक में इन आत्माओं के sections ग्रुप्स की संख्या निश्चित नहीं कही जा सकती है। प्रधान गुणों और प्रधान संस्कारों के हिसाब से भी चैतन्य आत्माओं की मालाएं होती हैं। लेकिन उस एक प्रधान गुण और संस्कार के आधार पर बनने वाली मालाओं के अन्दर भी अन्य अनेक प्रकार की मालाएं होती हैं। इसलिए ईश्वरीय महावाक्यों में यह कहा गया है कि माला के अन्दर भी और लड़ियां लगा देंगे। दिव्य दर्शी अध्यात्म वेत्ताओं ने आत्माओं के लोक का अध्ययन किया है। कुछ प्रयोग किए हैं। उन्होंने यह पाया कि वाकई ये चैतन्य आत्माओं के sections या ग्रुप्स अनादि आदि रूप से होते हैं। यह गहरी बात का भी पता चला कि इनमें सूक्ष्म ऊर्जा के लेन देन का भी कनेक्शन होता है। इसलिए हम एक होते हुए भी अनेक हैं और अनेक होते हुए भी एक हैं। चैतन्य आत्माओं के वृक्ष की जड़ें, टाल डालियां पत्ते फल फूल आदि का ज्ञान इस गहरी समझ को सहज सुलझा देते हैं। एकता और विभिन्नता का कॉन्सेप्ट और पूरा दर्शन इस चैतन्य आत्माओं के कल्प वृक्ष में अच्छी तरह से picturise किया हुआ है।
हमारी अपनी सही माला और मणके के संबंध संपर्क में आने से हमें कैसा अनुभव होगा या हो सकता है? वास्तव में यह बहुत सूक्ष्म है। हालांकि इसकी एक्यूरेसी को नहीं बताया जा सकता है। परन्तु फिर भी, इसे कुछ पारस्परिक व्यावहारिकता से, भावना और वैचारिक लेवल पर होने वाले कुछ अनुभवों से और कुछ वाईब्रेशनल फ्रिक्वेंसी से कम से कम 80% प्रतिशत तक इस तरह समझा जा सकता है :-
1. – आपका सम्बन्ध जिस प्रकार की माला से होगा उन आत्माओं के संबंध संपर्क में आते ही आपको बिना कुछ बोले ही सहजता के, सौहार्द्यता के और सुकून भाव के प्रकंपन अनुभव होंगे। वहां हिचकिचाहट या डर या अटपटा सा या भारीपन सा महसूस नहीं होगा।
2. – जो आपकी चैतन्य माला की आत्माएं होंगी उनके साथ एक सी अजनबी सी ही सही, वाइब्रेशनल निकटता अनुभव हो सकती है। यह सब भाव केन्द्र के लेवल पर स्वत: स्वभावतः ही होगा। यह एकाग्र होकर बारीकी से अनुभव करने पर होगा।
3.- जो आत्माएं आपकी माला वाली हैं, उन आत्माओं के साथ परस्पर संवाद और बातचीत अर्थात् कम्युनिकेशन में सहजता अनुभव होगी। सामान्य तौर पर परस्पर बातचीत में कोई सकुचाहट, डर या भारीपन अनुभव नहीं होगा। परस्पर संवाद बातचीत में आयु और ज्ञान या अधिक अनुभव की लघुता या गुरूता का (inferiority या superiority कॉम्प्लेक्स वाला कोई अवरोध अनुभव नहीं होगा।
4. – जो आत्माएं आपकी चैतन्य माला की होंगी, उनके सम्बन्ध संपर्क में आने पर आपका भाव केन्द्र आपको भावना के लेवल पर सूक्ष्म लेवल पर कुछ हल्के से सूक्ष्म स्पंदन भेज देगा। उन स्पन्दनों से आप परस्पर एक संबंधात्मक तारतम्यता सी अनुभव कर पाएंगे। लेकिन यह तभी होगा जब आप कर सजग सतर्क (अवेयरनेस) की स्थिति में होंगे। तब ज्ञान नहीं बल्कि मौन भाव पैदा होगा।
5. – जो आत्माएं आपकी चैतन्य माला वाली होती हैं, उनके सम्बन्ध संपर्क में जैसे ही आप आते हैं तो अत्यल्प समय में ही, वे आत्माएं आपको सहज ही स्वीकार कर करने के मनोभाव में होंगी। परस्पर गुणग्राहक दृष्टि भी अपने आप spontaneously बनेगी। यह सब स्वतः स्वभावताः होगा।
यदि स्थाई रूप की स्थिरता, संतुष्टि या सुकून अनुभव होने की बात कहें तो यह पक्का समझ लें। जो जिस चैतन्य आत्माओं की माला का चैतन्य मनका होगा वह उसी माला में रहने पर ही स्थाई रूप से स्थिरता, संतुष्टि और सुकून अनुभव करेगा। अस्थाई रूप से तो आत्माओं की अनेक प्रकार की स्थिति बन सकती है, आत्माएं अलग अलग विजातीय groups/मालाओं में भी जा सकती हैं, वह बात अलग है। अनुभव कहता है कि चैतन्य मालाओं के मनकों का परस्पर सूक्ष्म ऊर्जा का भी vibrational रूप से लेन देन होता। अपनी उचित सही original चैतन्य आत्माओं की माला में स्थिर रहिए और मेरू दाना परमात्मा के साथ अपने मन बुद्धि को tuned रखिए। तो स्वधर्म में रहना दो तरह का होता है। पहला आत्मिक स्थिति में रहना और दूसरा अपनी चैतन्य original माला में रहना। इसे भी स्वधर्म में रहना कहते हैं। इसमें स्वतः ही सुकून और शान्ति है। गुणों के वाइब्रेशन के कारण भी आत्माएं एक दूसरे के नजदीक आती हैं अर्थात् माला का मनका बनती हैं। इस संदर्भ में यह भी ध्यान रहे कि प्रत्येक आत्मा में कुछ न कुछ गुण और कुछ ना अवगुण होते नहीं। यह गुणों और अवगुणों का एक निश्चित अनुपात सब आत्माओं में होता है। चैतन्य आत्माओं के मनकों की निकटता बनने के लिए गुणों का अनुपात अर्थात् परसेंटेज ज्यादा होनी चाहिए। यदि आपस की वाइब्रेशनल फ्रिक्वेंसी का, पॉजिटिव एटीट्यूड का, कर्मों के परमाणुओं का, परसेंटेज ज्यादा होगा तो मनकों में आपस में निकटता होती है। यदि परस्पर गुणों की दृष्टि ज्यादा हो और अवगुणों की दृष्टि कम हो तो गुणों की दृष्टि का पलड़ा भारी होने के कारण उन मनकों में आपस में स्वीकार्यता और निकटता होगी।
चैतन्य आत्माओं की मालाओं के मनकों में कर्मों के परमाणु भी अपना role निभाते हैं। कर्मों के परमाणुओं के भी अपने वाइब्रेशंस होते हैं। अपनी माला को या नजदीक वाले चैतन्य मनकों को ठीक ठीक जानने पहचानने में कठिनाई भी हो सकती है। फिर भी यह विषय बहुत गहन है। ज्यादातर तो आत्माओं के मनकों का परिचय और निकटता यह सहज रूप से होती है। लेकिन यदि इसमें कठिनाई होती है तो इस विषय को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए। अनेक आत्माओं के लिए यह भी प्रतीक्षा का समय होता है। परमात्मा को समर्पित करने के बाद क्या करना चाहिए? परमात्मा को याद करते हुए स्वयं की अंतरशुद्धि का पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। जिन आत्माओं को इस लेवल की समझ होती है, वे आत्माएं अपने आप ही निर्संकल्प और निश्चिंत रहने लगती हैं। Thank you Share and inspire
Original Date : 30/4/2022

सृष्टि का नियम – विकास का सिद्धांत
8 अरब लोगों की दुनिया और थोड़े से आध्यात्मिक लोग। सृष्टि को सतयुग कैसे बनाएंगे? आइए जानते हैं?
कुछ लोग कहते हैं कि इतने थोड़े से लोगों की संख्या से पूरे विश्व का दिव्यीकरण कैसे होगा? इतने थोड़े से लोगों के द्वारा यह सृष्टि सतयुग कैसे बनेगी? उन्हें सृष्टि के विकास का यह नियम याद रहे। सृष्टि का यह नियम है कि विकास हमेशा क्वालिटी के आधार पर होता है, संख्या के आधार पर नहीं। विकास संख्या के अनुक्रम में नहीं होता। विकास क्वालिटी (गुणवत्ता) के अनुक्रम में होता है। यदि हम एक roughly आंकड़ा ही लें तो कह सकते हैं कि पूरे विश्व की आबादी में से 2% लोगों में भी श्रेष्ठ विचार और कर्म की वृत्ति का अभ्युदय हो जाए और उनकी आत्मिक वृत्ति बन जाए तो पूरी सृष्टि का सम्पूर्ण विकास हो सकता है अर्थात् सतयुग की रचना हो पूरी सकती है। 2% higher frequency वाली आत्माओं की ऊर्जा भी 98% आत्माओं की ऊर्जा को पीछे छोड़ देती है। सृष्टि और प्रबंधन का एक प्रसिद्ध नियम है कि हमारे 80% परिणाम केवल 20% महत्वपूर्ण क्वालिटी के प्रयासों से आते हैं। क्वालिटी ही वास्तव में यूनिवर्स की असली currency है। यहां क्वालिटी से हमारा भावार्थ है – उच्चतम मनोवृत्तियां जो आत्मिक स्थिति से बनती हैं। The higher highest frequencies of human beings. There is a universal law. Higher frequencies transform. Quality brings the evolution. The higher frequencies bring the holistic change. The quality of consciousness brings the evolution and not the quantity consciousness. Divinity means higher frequency matters. Divinity in minority matters. In other words, quality in minority matters. Such divine minority surpasses the majority. Explore the quality within you. The quality and divinity cannot be found in quantities. The process of spiritual evolution is gradual in the universe. Thank you

दिल जीतना और ऊंच पद की प्राप्ति का भावार्थ क्या है?
दिल पर चढ़ने का बहु आयामी क्या मतलब होता है?
हम प्रायः यह ईश्वरीय महावाक्यों में सुनते हैं। आज भी हमने यह सुना कि जो बाप के दिल पर चढ़ते हैं उन्हें ऊँच पद मिलता है। इसके गहरे अर्थ क्या क्या होते हैं? दरअसल हम जो गणित लगाते हैं वह बहुत ही लिमिटेड और narrow होता है। विश्व ड्रामा में इसके अर्थ बहुत गहरे और अनलिमिटेड होते हैं। दरअसल इस विश्व ड्रामा में कुछ विषयों की शत प्रतिशत यथार्थ व्याख्या नहीं हो सकती है। ड्रामा में कुछ बातों का कोई गणितीय कारण या समझ में आने जैसा कारण नहीं होता है। वे मानव बुद्धि की समझ से परे वाली बातें होती हैं। पर वे बातें फिर भी प्रैक्टिकल होती हैं। यह जो दिल पर चढ़ने और ऊँच पद मिलने का विषय है, यह भी कुछ ऐसा ही है। फिर भी हम यथासंभव आध्यात्मिक दृष्टिकोण से और आत्माओं की आदि अनादि फ्रिक्वेंसी की ऑटोमेटिकली व्यवस्था के अनुसार इसे समझने का प्रयास करते हैं।
इसका आध्यात्मिक रहस्य आत्मा के विकास के विज्ञान से जुड़ा है। “दिल पर चढ़ना” वास्तव में एक योग्यता है और ऊंच पद प्राप्त करना उसका परिणाम है। दिल पर चढ़ने और ऊंच पद का गहरा सम्बन्ध होता है। आध्यात्मिक जगत में ‘पद’ भौतिक दुनिया की तरह किसी नियुक्ति या चुनाव से नहीं मिलता, बल्कि यह फ्रिक्वेंसी कंपन और गुणों का खेल है।
दिल पर चढ़ने की प्रक्रिया क्या होती है? सच्चाई, सफाई और निस्वार्थ प्रेम की प्रक्रिया होती है। जब हम किसी के दिल पर चढ़ते हैं, तो इसका मतलब है कि हम मन वचन और कर्म से उस आत्मा के साथ एकाकार हो गए हैं। इसे soul की ऊर्जा का integration कहते हैं। ऊंच पद का अर्थ है कि ऊंच फ्रिक्वेंसी की स्थिति बनाने का परिणाम। ‘ऊंच पद’ का अर्थ है ‘ऊंची चेतना’ की स्थिति बनना। Higher Consciousness का होना। जो व्यक्ति जितना अधिक दूसरों के प्रति प्रेमयुक्त और उदार होता है, उसकी आत्मा का प्रकाश उतना ही बढ़ता जाता है।
इसे ब्रह्मांड का नियम ही समझें कि जो आत्मा, चेतना के उच्चतम स्तर पर होती है, वही स्वराज्य अधिकारी की स्थिति पर पहुंचती है। ईश्वरीय नियम के अनुसार वही ‘शक्ति’ और ‘शासन’ के उच्चतम स्तर पर बैठने की अधिकारी होती है। इसे ही सेल्फ सवेरेंटी कहते हैं। यदि इसे वर्तमान दौर के परिप्रेक्ष्य में कहें तो ऐसा कह सकते हैं। बिना दिल जीते मिला हुआ पद केवल ‘सत्ता’ होता है। लेकिन दिल जीतकर अर्थात् स्वराज्य अधिकार की स्थिति से मिला हुआ पद एक ‘दिव्य अधिकार’ होता है।
जो आत्माएं प्रेम शान्ति और सेवा परोपकार से दूसरे लोगों के “दिलों को जीतने” का कार्य करती हैं, उनकी ऊर्जा बहुत सघन और परिष्कृत हो जाती है। यही ऊर्जा उन्हें ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित करती है। आत्माओं का “दिल पर चढ़ना” इस बात का प्रतीक है वे आत्मायें दूसरों के प्रति संवेदनशील हैं और दूसरों के साथ ऊर्जा के स्तर पर जुड़ा हुआ अनुभव करती हैं।
इस विषय को एक दूसरे ही आयाम में भी समझना जरूरी है। दिल पर चढ़ने की स्थिति को हम साकारी, आकारी और निराकारी स्थिति के हिसाब से भी इस तरह समझ सकते हैं।
जब हम शरीर में होते हैं, तो यह ‘दिल पर चढ़ना’ कार्मिक संबंधों के रूप में प्रकट होता है। जैसे उदाहरण के तौर पर। मनुष्य आत्माओं के व्यवहार या उपस्थिति का आपस में इतना गहरा प्रभाव पड़ जाए कि वह भौतिक अस्तित्व का हिस्सा बन जाए। जब आत्माएं शरीर धारण करके पारस्परिक सम्पर्क सम्बन्ध में आती हैं, तो उनकी ऊर्जा के सम्पर्क संबंध में आने से मन और भाव में एक “मान्यता” पैदा होती है। एक recognition पैदा होती है। यह साकार रूप में वाइब्रेशन लेवल पर गहरे संबंध का अनुभव होता है। आकार में दिल पर चढ़ने का अर्थ क्या होता है? यह मानसिक छवियों या स्मृतियों के आधार पर होता है। यह भौतिक उपस्थिति से परे, विचारों और भावनाओं के स्तर पर होता है। जब आत्माओं के आत्मा के गुण या ऊर्जा या सूक्ष्म स्मृतियां मन के आकार को प्रभावित करने लगती है तो इसको भी दिल पर चढ़ना कहते हैं। बिना किसी चेहरे या नाम के, केवल एक शुद्ध कंपन (Vibration) के रूप में किसी का आपके अस्तित्व में समा जाना। निराकार रूप से दिल पर चढ़ने का अर्थ होता है ‘आत्मीय ऊर्जा का एकीकरण’। आत्माओं के निराकार लोक में आत्माएं एक दूसरे को रंग और प्रकाश के कंपन के आधार पर पहचानती हैं। इन साकारी आकारी और निराकारी की तीनों स्थितियों को ध्यान से देखें तो ये तीनों एक लेवल पर आकर संयुक्त नजर आती हैं। जबकि तीनों स्थितियां अलग अलग हैं। इसलिए किसी एक प्रकार की स्थिति को समझ कर यह नहीं कहा जा सकता है कि हमने उसे पूरा समझ लिया है। इस स्थिति को समझने के लिए हमें इसे समग्रतः समझना पड़ेगा। इनकी संयुक्ता इसे और भी ज्यादा पेचीदा (complex) बना देती हैं। दिल पर चढ़ने की यह पेचीदा स्थिति मनुष्य आत्माओं को मौन सहमति के लिए बाध्य कर देती है।
जब आत्माएं पारस्परिक विकास में सहायक होती हैं, तो उनमें संबंध बिना किसी भौतिक आकर्षण के, केवल शुद्ध ऊर्जा और ज्ञान के प्रकाश के रूप में establish होते हैं। ‘दिल पर चढ़ना’ उनके लिए केवल एक सांसारिक आकर्षण नहीं है, बल्कि आत्माओं के बीच का एक रूहानी रिश्ता होता है जो जन्मों-जन्मों तक ऊर्जा के स्तर पर बना रहता है।
इसे हम ऐसा भी कह सकते हैं कि यह एक ऐसा रिश्ता होता जो समय, दूरी या भौतिक देह त्यागने से भी खत्म नहीं होता। सिम्पल शब्दों में यह दिल पर चढ़ना आत्मीय रिश्ता होता है। समीप ता के कारण फ्रिक्वेंसी में भी समानता अपने आप होती है। Souls के groups को कोई बनाता नहीं है। फ्रिक्वेंसी में समानता के कारण भी सूक्ष्म लेवल पर groups भी अपने आप automatically बनते हैं। यह दिल पर चढ़ने और ऊँच पद मिलने में भी souls के ग्रुप की जन्म जन्म की आत्माओं की पारस्परिक की हुई प्रतिबद्धता होती है। यह सब बहुत ही सूक्ष्म रूप से secret रूप से underneath ही सिर्फ Soul to soul के Connection का खेल होता है। इसे साधारण बुद्धि से नहीं समझा जा सकता है। कुल मिलाकर विषय का सार संक्षेप यह है कि यह जो दिल पर चढ़ने और ऊंच पद प्राप्त करने का जो पेचीदा मामला है, यह तो आत्माओं के groups के अन्दर आत्माओं के बीच में मन वचन कर्म और वाइब्रेशन के लेवल पर सेवा और कार्मिक संबंध का खेल है। इस सेवा और कार्मिक संबंधों आत्माओं के पारस्परिक नजदीकियां समीपताएं नेचुरल आदि अनादि हैं। जहां जिन आत्माओं में नजदीकियां समीपताएं हैं, जहां जिन आत्माओं में फ्रिक्वेंसी की समानताएं हैं वहां यह “दिल पर चढ़ने” की स्थिति बनती है। वहां परमात्मा के दिल पर चढ़ने की स्थिति भी बनती है। वहां ऊँच पद प्राप्त करने की स्थिति भी बनने की स्थिति भी बनती है। इस आध्यात्मिक तथ्य को हर कोई नहीं समझ सकता है। विषय के इस पूरे अनुक्रम की गहनता को समझने से हमें यह पता चलता है कि इस सम्पूर्ण जड़ चेतन के विश्व अनादि अविनाशी ड्रामा में चैतन्य आत्माओं का आत्माओं से निकटता का सम्बन्ध आदि अनादि रूप से होता है और रहेगा तथा आत्माओं का पारस्परिक सेवा और परोपकार का विषय भी सदा से है और रहेगा। ज्ञानयुक्त होकर बहुत सी बातों को तथ्य से समझने से मानसिक शान्ति और साक्षी का भाव स्वतः परछाई की तरह आ जाता है। हम जितने ज्ञानयुक्त और समझदार बनते हैं उतने ही शान्त और साक्षी हो जाते हैं। Thank you

सात पीढ़ियों का उद्धार सम्भव है। विज्ञान यह गारंटी करता है। कैसे?
क्वांटम एनर्जी विज्ञान के रिवर्स हीलिंग का दावा। क्वांटम एनर्जी विज्ञान कहता है कि आपके DNA में करोड़ों वर्षों का पूरा डेटा है। करोड़ों वर्षों में जैसी भी स्थितियां और परिस्थितियां बनी हैं, उन सबकी सूक्ष्म एनर्जी का डेटा क्वांटम एनर्जी के रूप में DNA में अंतर्निहित हैं। क्वांटम विज्ञान का चेतना का आब्जर्वर इफैक्ट कहता है कि DNA में भी परिवर्तन सम्भव है। जब मेरे द्वारा मेरी पॉजिटिव सोच, भाव और कर्म में पॉजिटिव बदलाव होते हैं तो मैं अपने DNA को बदल रहा होता हूं। इस तरह अपनी पिछली कम से कम सात और अगली सात पीढ़ियों को हील कर रहा होता हूं। इस सूक्ष्म प्रक्रिया में बड़े सूक्ष्म एनर्जी मैकेनिक्स काम करते हैं।
वह DNA में बदलाव कैसे होता है? जब मैं साक्षी की स्थिति में रहता हूं, क्षमा भाव में रहता हूं, आत्मिक भाव में रहता हूं, शान्त स्थिति में रहता हूं, सूक्ष्म लेवल के ज्ञान की समझ की स्थिति में रहता हैं और राजयोग मेडिटेशन की गहरी अवस्था का अनुभव करता हूं तो मैं उस अगली या पिछली पीढ़ियों की नेगेटिव एनर्जी की वाइब्रेशनल क्वांटम chain को तोड़ रहा होता हूं। तब मेरे पूर्वज और वंशज के बीच एक वैक्यूम क्रिएट हो जाता है और वह नेगेटिव एनर्जी ऊर्जा न्यूट्रल mode में चली जाती है। इससे आने वाली पीढ़ियां नेचुरली शान्त रहेंगी। इसे future healed effect कहते हैं। दूसरी तरफ मेरे द्वारा पूर्वज (पीछे वाली पीढ़ियां) भी हील होंगे। उनके द्वारा फैलने वाली वह नेगेटिव एनर्जी भी न्यूट्रल mode पर चली जाएगी। दूसरी तरफ क्योंकि मेरी स्थिति दिव्य और पॉजिटिव बनी हुई है तो वह नेगेटिव एनर्जी मेरे द्वारा भी manifest ही नहीं होगी। इस पूरी प्रक्रिया में हीलिंग का ripple effect भी काम करता है और रिवर्स हीलिंग इफैक्ट भी काम करता है। लेकिन यदि मैं ज्ञान की गहरी समझ और योग के पुरुषार्थ द्वारा वाइब्रेशनल क्वांटम एनर्जी की chain को नहीं तोड़ता हूं, तो DNA में कोई बदलाव होना सम्भव नहीं होता है और स्थिति वैसी की वैसी नेगेटिव बनी रहती है।
तात्पर्य यह हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति ऐसा समझे कि मैं अपने पूर्वजों और वंशजों का “क्वांटम Healer/changer” हूं। हरेक व्यक्ति अपने लिए ऐसा समझे कि जब मैं ज्ञान और योग के द्वारा खुद को हील कर रहा होता हूं, तो उस समय मैं वास्तव में अपने पूरे अस्तित्व के ‘टाइम-लाइन’ को ही हील कर रहा होता हूं अर्थात् अनेक पीढ़ियों के DNA में परिवर्तन कर रहा होता हूं। ईश्वरीय अध्यात्म विज्ञान तो 21 पीढ़ियों (जन्मों) के दिव्य परिवर्तन का गारंटी करता है। Yes, परमात्मा की दिव्य ऊर्जा के प्रताप से 21 पीढ़ियों के लिए DNA में भी परिवर्तन 100% सम्भव है। विज्ञान यह सत्य प्रमाणित करता है कि हमारी भावनाएं, सोच, कर्म और दुआओं के वाइब्रेशंस सात पीढ़ियों तक पहुंचते हैं। वाइब्रेशन के इस क्वांटम एनर्जी DNA विज्ञान से प्रत्येक व्यक्ति को एक चेतावनी भी मिलती है। हरेक व्यक्ति अपने लिए ऐसा ही समझे कि यदि मैं अपनी भावनाओं, सोच और कर्मों में दिव्य परिवतन नहीं लाता हूं तो द्वापरयुग से बनी हुई नेगेटिव स्थिति का इफैक्ट भी आने वाली पीढ़ियों तक पड़ता रहता है।
सात पीढ़ियों के DNA में परिवर्तन सम्भव कैसे है? प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व के टाइम लाइन की सात पीढ़ियों तक DNA परिवर्तन करने के लिए केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेवारी ही नहीं है। पूर्वजों की ज्यादा जिम्मेवारी हम इसलिए कहते हैं क्योंकि एनर्जी ऊपर से नीचे की ओर बहती है। Energy flows from top to bottom. लेकिन वंशजों की जिम्मेवारी भी कोई कम नहीं है। मान लीजिए यदि आपकी कर्मों की vibrational chain में किसी प्रकार की नेगेटिव या complexity के बनने लिए दो दर्जन लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष एनर्जी का प्रभाव निमित्त बना है तो उन दो दर्जन लोगों को ही अपने अपने हिस्से का DNA परिवर्तन करना होगा तब वह chain टूटकर वैक्यूम क्रिएट होता है। इसे ही synchronicity क्वांटम एनर्जी इफैक्ट कहते हैं।
इस विज्ञान को समझकर ज्ञान और योग के पुरुषार्थ के द्वारा जीवन को दिव्य बनाएं। सेवा का कर्म भी ज्ञान और योग के पुरुषार्थ का ही प्रतिफलन होता है। सिर्फ ऊपर ऊपर से देखने से हमें ऐसा आभास सा होता है कि सेवा का थोड़ा अलग डायमेंशन है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ज्ञान और योग का पुरुषार्थ ही जब वैरायटी सेवा के रूप में प्रकट (manifest) होता है तो हमें सेवा के अलग होने का आभास सा होता है। पर गहरे में सेवा और ज्ञान योग का पुरुषार्थ एक ही है। यह भी तो हो सकता है जो व्यक्ति वर्तमान समय सेवा में बहुत ज्यादा प्रत्यक्ष है, वह आप अपने अतीत में ज्ञान और योग के पुरुषार्थ बहुत तीव्र रहा हो। उसके ज्ञान योग का पुरुषार्थ ही उसे यहां तक, सेवा के इस तरह के डायमेंशन तक लाने और प्रत्यक्ष करने में निमित्त बना हो। ज्ञान और योग तथा सेवा के विषय का विस्तार करोगे तो हमें यह अच्छी तरह समझ में अवश्य आएगा कि ज्ञान और योग का पुरुषार्थ ही भिन्न भिन्न तरह की सेवा करने और कराने के स्वतः ही निमित्त बनता है।

सर्व शास्त्र शिरोमणि में – भगवानुवाच: “ज्ञानी तू आत्मा मुझे प्रिय है।” कैसे?
इसका गूढ़ तात्पर्य क्या है?
इसे पूरा सुनें
Copy of 13 April 2025.
The Spiritual richness is greater than any material richness.
Spiritual richness is the source of all kinds of richness.
A quiet mind can realise this richness. Anyone can realise this fact by stabilizing into the deepest core of their selves. It is the supreme fact. It has tremendous invisible powers. It is only single dimensional fact. It is other worldly wisdom. It cannot be understood by the ordinary souls. It seems single dimensional evolution of the consciousness. But it has it’s other important invisible dimensions too.
This can be known by the rare knowers only. It requires a lot of spiritual wisdom and faith. The spiritual richness is much more vital than material richness. It is actually the source and fundamental of all physical richness. Spiritual richness is long lasting. Once we achieve this state of consciousness, nothing left unachieved. A lot of systematic intense spiritual penance/ efforts and a lot of ethical disciplinary abandons are must to achieve such stage of consciousness. Great. Just ponder over it. You would truly experience something divine in your own realm.. Thank you

समर्पण भाव की अल्केमी
स्व उपकार या परोपकार के लिए किए जाने वाले सभी प्रकार के श्रेष्ठ कार्यों के मूल में एक ही आधारभूत भावना होनी चाहिए जिसके होने से कार्यों की frequency higher लेवल की होती है। इसके कारण ही कार्यों की क्वालिटी स्वतः हायर (पवित्र) हो जाती है। वह मूल भावना है Surrender to God, (Surrender to Supreme Shiva Baba) की भावना। ईश्वरम् समर्पण्यामि की भावना। इस भावना में निमित्तपन की भावना भी स्वतः समाहित रहती है। फिर लम्बे समय के बाद इसी स्थिति की पराकाष्ठा (highest level) की स्थिति यह भी बनती है जब निमित्त भी स्वयं परमात्मा ही हो जाते हैं।
*त्याग और भोग अलग अलग चीजें नहीं हैं। भोग का यहां अर्थ है प्राप्तियां।*
जिसने त्यागा उसी ने भोगा। जो त्यागता है वही भोगता है। बहुत गहरे तल पर त्याग और भोग संयुक्त हो सकते हैं। यह साधारण लोगों की समझ से परे की बात है। अनुभवों के लेवल पर हमारे अवचेतन या अचेतन मन में हमेशा विरोधाभास रहते हैं। लेकिन हमें वे एक ही समय पर प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते हैं। इसका मतलब यह हुआ जो आज खाली है, वह कभी भरपूर रहा हुआ था। जो आज भरपूर है वह कभी खाली रहा होगा। वही व्यक्ति त्याग सकता है जिसने भोगा हुआ होगा। वही व्यक्ति भोग सकता है जिसने त्यागा हुआ होगा। यह वास्तव में कौन सा सत्य है? यह ऐसा सत्य है जिसको चेतना (consciousness) ने अनेकानेक जन्मों के विकास के चक्रवत क्रम में अनुभव किया हुआ है। यह विरोधाभाषी सत्य लाखों करोड़ों वर्षों की लम्बी यात्रा के बाद परिपक्व हुआ है और फिजिकल और मानसिक लेवल पर व्यावहारिक सत्य बना है। जीवन के सभी अनुभव मन के कई तलों पर लगातार पुनरावृत रूप से घटित होते गए और यह विरोधाभाषी सत्य बनता चला गया। अवचेतन और अचेतन मन के लेवल पर इस सत्य के अनुभव सभी आत्माएं हैं। आज कोई भी बुद्धिमान और योगी व्यक्ति इस सत्य को ठोक बजाकर सार्वजनिक रूप से कहने की स्थिति में है कि हां मन के लेवल पर ऐसा सत्य है – त्याग और भोग दो अलग अलग चीजें नहीं हैं। यह आंतरिक विरोधाभास सत्य है। भाषा और शब्दों का फर्क होता है। यह कुछ ऐसा ही है जिसके लिए कहा गया है – “एकम सत्य विप्र बहुधा वदंति”।
जीवन के इस विरोधाभास सत्य को जिस व्यक्ति ने समझ लिया, वह व्यक्ति अपनी शान्ति को हमेशा ही बढ़ाता रहता है। वह शान्त हो जाता है। तनाव उससे कोसों दूर चला जाता है।
उपनिषद का वचन है। “तेन त्यगतेन भुजितः” – अर्थात् उसी ने भोगा जिसने त्यागा। जो त्याग सकता है वही भोग सकता है। यह हमें उल्टा लगेगा… परन्तु यही गहरे में मनोवैज्ञानिक रूप से सत्य है।
हम सुख चैन का अनुभव करने के लिए सुख चैन को छोड़ देते हैं। – अरस्तू
यह हास्यास्पद है। जीवन एक अस्पष्ट और उलझन भरी पहेली की तरह है। लेकिन यही सत्य है। यही गति का नियम भी है। गति सदा वर्तुलाकार होती है। समय को हम देख नहीं सकते हैं। पर समय भी वर्तुलाकार है। जो इस सिद्धांत को तत्व से जानता है वह सक्रीयता और निष्क्रीयता दोनों में समभाव रखता है। वह सदा सम स्थिति में ही रहता है। वह दोनों ही स्थितियों में विचलित नहीं होता है। वह दोनों ही स्थितियों में अति भी नहीं करता है। वह जीवन रूपी पहेली के पहिए की विराम (निष्क्रीयता) की अवस्था में भी सदा सक्रीयता देखता है। वह पहेली को हास्यास्पद रूप से समझते हुए हर्षित भी रहता है। जीवन को गंभीरता से ना लेते हुए सदा सहजता में जीता है। हम सब विकास के निरंतर क्रम में चलते हुए भी नियम से आबद्ध रहते हैं। इसका गहरा अर्थ यह हुआ कि त्यागना और भोगना कहीं गहरे में संयुक्त हैं। इसका भावार्थ यह भी हुआ कि समय के वर्तुलाकार क्रम में भोग के बाद त्याग और त्याग के बाद भोग बारी बारी चलते रहते हैं। बहुत लोगों को इस प्रज्ञा को समझना कठिन लगेगा। लेकिन यही प्रकृति का सिद्धांत अर्थात नियम है।
It is the psychological controversial understanding. It is the deepest core philosophical understanding. It is very true. But to explore and to examine it, we must have to go into the levels of our mind. Our subconscious, unconscious and super conscious mind can reveal this fact exactly. We must understand it. Due lack of wits and wisdom, many people misinterpret it on their own. We must not misinterpret it. Thank you
